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छोटे विवादों को अब थानों की चौखट पर सुलझाएंगे ‘डेशिंग वॉलेंटियर ऑफ इंदौर’

इंदौर। कानून व्यवस्था और गंभीर अपराधों की विवेचना में व्यस्त पुलिस का सबसे ज्यादा वक्त घरों की खटपट, पड़ोसियों में कहासुनी और पति-पत्नी में पड़ी दरार पाटने में ही बीत जाता है। सड़कों, मोहल्लों में होने वाले छोटे-छोटे विवाद के बाद लोग गुस्से में थाने पहुंचकर एक-दूसरे पर केस दर्ज करवा देते हैं। पिछले तीन वर्षों में इस तरह के 33 हजार से ज्यादा केस दर्ज हो चुके हैं। बाद में अहसास होता है तो मामला खत्म करवाने के लिए पुलिस अफसरों से अनुरोध करते हैं लेकिन केस दर्ज हो जाने की वजह से उन्हें कोर्ट में जाना होता है। पुलिस अब ऐसे मामलों को थानों की चौखट पर ही सुलझाने की तैयारी में है। आइजी ‘डेसिंग वॉलेंटियर ऑफ इंदौर’ की टीम बना रहे हैं।
आइजी योगेश देशमुख के मुताबिक, ज्यादातर मामले थोड़े से गुस्से और अहम के टकराव के कारण थानों तक पहुंचते हैं। बाद में उनमें समझौता तो हो जाता है लेकिन आपराधिक प्रकरण का निराकरण कोर्ट से ही होता है। पढ़े-लिखे लोगों को कोर्ट और वकीलों के कारण सालों तक चक्कर काटने पड़ते हैं। ऐसे विवादों को मध्यस्थता से सुलझाने के लिए ‘डेसिंग वॉलेंटियर ऑफ इंदौर’ नाम के टीम बनाई जा रही है। इसमें रिटायर पुलिस अफसर, मजिस्ट्रेट और शिक्षित युवाओं को शामिल किया जाएगा। प्रतिदिन थानों में दर्ज होने वाले छोटे-मोटे मामलों से पुलिस का बोझ तो हल्का होगा, सैकड़ों लोग बेवजह की कानूनी उलझन से भी बच जाएंगे। आइजी के मुताबिक, कई बार तो पड़ोसी से हुए विवाद और दर्ज प्रकरण के कारण नौकरी पेशा व्यक्ति का विदेश जाना तक टल जाता है। प्रकरण का निराकरण न होने से उसका पासपोर्ट तक नहीं बन सकता
ऐसी होगी टीम
चयन : ‘डेसिंग वॉलेंटियर ऑफ इंदौर’ में स्वच्छ छवि वाले युवाओं, सेवानिवृत्त पुलिस अफसर और सेवानिवृत्त मजिस्ट्रेट सहित क्षेत्र से वरिष्ठ नागरिकों को शामिल किया जाएगा।
अधिकार : वैसे तो उन्हें कोई विशेष अधिकार प्राप्त नहीं होंगे, लेकिन काउंसिलिंग के लिए पृथक से व्यवस्था होगी। विवादित पक्षों को समझाने और सुलह के बाद बाकायदा दोनों पक्षों से लिखा-पढ़ी भी करवा सकेंगे।
मॉनीटरिंग : ‘डेसिंग वॉलेंटियर ऑफ इंदौर’ की थाना स्तर पर मॉनीटरिंग होगी। टीम की काउंसिलिंग और सुलह से दोनों पक्ष राजी हैं, इसके लिए थाना प्रभारी के समक्ष पेश होकर सहमति देंगे।
फायदे : मामूली मारपीट, धमकी, गालीगलौच, गाड़ी टकराने पर पीटा जैसे केसों के कारण पुलिस का काफी वक्त खराब होता है। विवेचक केस डायरियां लेकर जांच और चालान में उलझे रहते हैं। आवेदक को बयान, मौका निरीक्षण, सुबूतों के लिए बार-बार थाने आना पड़ता है। अनावेदक का आपराधिक रिकॉर्ड तैयार हो जाता है। नौकरी, पासपोर्ट के लिए सत्यापन नहीं हो पाते। अगर दोनों पक्ष आपस में बैठकर बातों को मान लेते हैं तो सभी का फायदा होगा।

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