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2014 में मोदी तूफान से भी टकरा गई थी सिंधिया लहर…फिर धीरे-धीरे कांग्रेस से हो गया मोह भंग?

ग्वालियर: ज्योतिरादित्य सिंधिया ग्वालियर राजघराने के वो चिराग हैं जिन्होंने मध्य प्रदेश से लेकर दिल्ली तक अपनी राजनीति का लोहा मनवाया है। चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस उनका रुतबा किसी भी पार्टी में कम नहीं हुआ है। भले ही सिंधिया को बीजेपी में शामिल हुए 10 महीने ही हुए हैं लेकिन आज भी मध्य प्रदेश की राजनीति में उनके दखल के बिना कोई बड़ा फैसला नहीं होता है। आज वे अपना 50वां जन्मदिन मना रहे हैं। भाजपा के कई बड़े दिग्गज नेताओं ने उन्हें बर्थडे की बधाई दी है। हालांकि वे इन दिनों दिल्ली निवास में रह रहे हैं। आईए उन कुछ कारणों को जानते हैं जिनकी वजह से सिंधिया ने बीजेपी की ओर रुख किया…

राजनीति में एंट्री…
ग्वालियर राजघराने से संबंध रखने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया को राजनीति विरासत में मिली। पिता माधवराव की मौत के बाद 18 दिसम्बर को ज्योतिरादित्य सिंधिया राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी से जुड़ गये और उन्होंने अपने पिता की सीट गुना से पहला चुनाव लड़ा और बड़ी जीत के साथ वे सांसद बने। इसके बाद मई 2004 में फिर से चुना गया, और 2007 में केंद्रीय संचार और सूचना प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री के रूप में केंद्रीय मंत्री परिषद में शामिल किया गया। उन्हें 2009 में लगातार तीसरी बार फिर से चुना गया और इस बार उन्हें वाणिज्य और उद्योग राज्य मंत्री बनाया गया। 2014 में जब देश भर में मोदी लहर थी बावजूद इसके सिंधिया ने गुना सीट से फिर से कांग्रेस की जीत का परचम लहराया सासंद बने।

मोदी तूफान के आगे भी डटे रहे सिंधिया…
अबकी बार मोदी सरकार, अच्छे दिन आएंगे के नारे मैदान में उतरी बीजेपी 30 साल बाद इतने बड़े बहुमत से सरकार बनाई। पहली बार बीजेपी ने खुले तौर पर राम मंदिर पर बात न करके विकास को मुद्दा बनाया और गुजरात और  नरेंद्र मोदी ही इसका मुख्य केंद्र रहे। बीजेपी गठबंधन यानी एनडीए ने 336 सीटों पर जीत हासिल की थी। इसमें से 283 सीटों पर बीजेपी अकेले विजयी रही। जबकि पिछले 10 सालों से सत्ता में काबिज रही कांग्रेस का 2014 में प्रदर्शन बेहद बुरा रहा और वह सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गई। वहीं कांग्रेस की अगुवाई वाले यूपीए को महज 60 सीटें मिली थीं। इनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया एक थे। कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बीजेपी के प्रत्याशी जयभान सिंह को 120792 वोटों से शिकस्त दी थी

वहीं मध्य प्रदेश के 2018 के विधानसभा चुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस को जिताने में अहम भूमिका निभाई। जनता पर सिंधिया का रंग चढ़ा हुआ था लेकिन सीएम के रुप में कमलनाथ को कुर्सी पर बैठाया गया। धीरे-धीरे कांग्रेस और सिंधिया में दूरी बढ़ने लगी। एक बढ़ा झटका तब लगा जब 2019 के लोकसभा चुनाव में गुना सीट से केपी यादव ने सिंधिया को हरा दिया। सिंधिया राजघराने की इस सीट से यह पहली हार थी। इसके बाद तो मानों हवा ने रुख ही बदल लिया हो…वादाखिलाफी के लिए सिंधिया का सड़क पर उतर जाउंगा का कहना और कमलनाथ का तो उतर जाओ…ये कुछ ऐसे बयान थे जिन्होंने मध्य प्रदेश की राजनीति में नया इतिहास रच डाला।  सिंधिया का कांग्रेस से मोहभंग हो गया। हालांकि कुछ और राजनीतिक बड़े कारण भी है।

  • 2018 में विस चुनावों में सिंधिया को नजरअंदाज करके कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष बना देना
  • टिकट वितरण के लिए भी सिंधिया से भेदभाव
  • चुनाव सिंधिया के दम पर जीते, मुख्यमंत्री कमलनाथ को बनाया
  • सिंधिया समर्थक विधायकों को अहम पदों से दूर रखना
  • एक बार फिर से प्रदेशाध्यक्ष पद से दूर रखा गया
  • सरकार में सिंधिया के पत्रों पर कोई कार्रवाई नहीं होती थी
  • सिंधिया समर्थक मंत्रियों सरकार में कम सुनवाई
  • ग्वालियर सीट से टिकट नहीं देना भी एक बड़ा कारण
  • बयानों से बार बार अपमान करना
  • राज्य सभा चुनाव में टिकट न देना

इसके बाद धीरे धीरे वे कमलनाथ सरकार के राज में राजनीति से गायब रहने लगे और 10 मार्च 2020 में कांग्रेस पर वादाखिलाफी और उपेक्षा का आरोप लगाकर बीजेपी ज्वाइन की। कमलनाथ को मध्य प्रदेश की सत्ता से आउट करने और शिवराज सिंह को सीएम में इनका बड़ा योगदान रहा। इन्होंने 22 विधायकों जिनमें मंत्री भी शामिल थे के साथ इस्तीफा देकर कमलनाथ सरकार गिरा दी थी और बीजेपी को वापस सत्ता में पहुंचाया।

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