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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृढ़ रुख के चलते चीनी सेना को सरहद से अपने कदम पीछे खींचने पड़े

हमारी सरहदों पर बीते कुछ दिन खासे हलचल भरे रहे। प्रतीत होता है कि भारत की बढ़ती शक्ति को चुनौती देने के लिए हमारे विरोधियों ने हाथ मिला लिए हैं। वैसे तो आजादी के बाद से ही चीन और पाकिस्तान के साथ हमारा संघर्ष होता आया है, लेकिन अब काफी कुछ बदल गया है। मोदी सरकार अनुपयुक्त आदर्शवाद के बजाय चाणक्य नीति पर ही चलती दिख रही है। लद्दाख में चीनी सेना की हरकत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत किसी भी दबाव के आगे नहीं झुकेगा। उनके इस दृढ़ रुख के परिणामस्वरूप चीनी सेना को अपने कदम पीछे खींचने पड़े। दोनों देशों के राजनयिक तनाव घटाने के लिए वार्ता में जुटे हैं। यह दृढ़संकल्पित आचरण नए दौर की चाणक्य नीति का जीवंत प्रमाण है।

आजादी के बाद से भारत आदर्शवादी विदेश नीति का पालन करता रहा जो कभी उपयुक्त नहीं रही

चाणक्य जिन्हें कौटिल्य के नाम से भी जाना जाता है, संभवत: समग्र संसार के पहले राजनीतिक रणनीतिकार थे। राष्ट्रीय हितों की पूर्ति के लिए उन्होंने स्वयं को शक्तिशाली बनाने के साथ ही पड़ोसियों पर नजर बनाए रखने की वकालत की। इसके उलट आजादी के बाद से ही भारत आदर्शवादी विदेश नीति का पालन करता रहा जो वैश्विक राजनीति के वास्तविक परिदृश्य के खांचे में कभी उपयुक्त नहीं रही।

70 साल बाद मोदी सिद्धांत के तहत भारतीय कूटनीति में नया अध्याय शुरू हुआ

स्वतंत्रता के 70 साल बाद मोदी सिद्धांत के तहत भारतीय कूटनीति में नया अध्याय शुरू हुआ है। इसमें भारत के हितों से समझौते का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। चीन ने द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात स्वतंत्रता हासिल कर शुरुआत से ही अपना ध्यान औद्योगीकरण और आंतरिक वृद्धि पर केंद्रित किया। अब अधिकांश देश और वैश्विक अर्थव्यवस्था आपूर्ति शृंखला के लिए चीन पर निर्भर है। इससे वह दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन बैठा। बड़ी आबादी, मजबूत अर्थव्यवस्था और सक्षम सेना ने चीनी नेताओं को यह गुंजाइश दी कि वे आर्थिक एवं सैन्य, दोनों मोर्चों पर अपनी दबंगई दिखा सकें। खासतौर से दक्षिण चीन सागर में उन्होंने यह किया भी है।

भारत के प्रति चीन की नीति हमेशा नियंत्रण की रही

भारत के प्रति चीन की नीति हमेशा नियंत्रण की रही है। जब 1940 के दशक से दोनों ही देशों ने औपनिवेशिक समाप्ति के नए युग में प्रवेश किया तबसे चीन ने भारत को अपना दीर्घकालिक प्रतिस्पर्धी ही माना और इस नाते उस पर अंकुश लगाने की मंशा रखी। इसीलिए वह भारत पर दबाब बनाए रखने की कोशिश में लगा रहता है। वह भारत के उभार को दबाने का प्रयास करता है और इसके लिए हरसंभव तिकड़म आजमाता है। भारत के खिलाफ चीन की इस रणनीति के संकेत 1950 के दशक से ही मिलने लगे थे जब उसने पाकिस्तान को संरक्षण देना शुरू किया। उसने इस कंगाल देश को अपने पिट्ठू के तौर पर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। उसका मुख्य मकसद पाकिस्तान के जरिये अपना उल्लू सीधा करना था।

चीन ने भारत की घेराबंदी के लिए  ‘मोतियों की माला’ नाम की रणनीति बनाई

चीन ने काफी पहले ही अपनी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का अनुचित फायदा उठाना शुरू कर दिया था। भारत की घेराबंदी के लिए उसने दक्षिण पूर्व एशिया से लेकर अफ्रीका तक ‘मोतियों की माला’ नाम की रणनीति बनाई। बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत श्रीलंका में हंबनटोटा और पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह और गुलाम कश्मीर में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे जैसी परियोजनाओं के जरिये हाल के वर्षों में ये गतिविधियां और तेजी से बढ़ी हैं।

चीन ने भारत के पड़ोस में अपने पिट्ठू बनने लायक देश तलाशने शुरू कर दिए

ऐसे में कोई हैरानी की बात नहीं कि चीन ने भारत के पड़ोस में अपने पिट्ठू बनने लायक देश तलाशने के प्रयास तेज कर दिए। नेपाल के हालिया घटनाक्रम से यह बखूबी जाहिर भी होता है। चीन केवल एशिया ही नहीं, बल्कि गरीब अफ्रीकी देशों को भी अपने कर्ज के जाल में फंसाकर वैश्विक मामलों में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। बीते कुछ वर्षों में भारत का रवैया भी बदला है। इसमें संदेह नहीं कि इससे पहले हमने कई दशक व्यर्थ ही गंवा दिए, जबकि इस दौरान हमें अपनी सीमाओं और सैन्य क्षमताओं को और मजबूत बनाना चाहिए था ताकि सरहदों की सुरक्षा को लेकर सुनिश्चित हो सकते। यह तब और आवश्यक हो जाता है जब हमारे पड़ोस में ऐसे देश हों जो कभी भी उन्मादी हो सकते हैं।

भारत सीमावर्ती राज्यों में बुनियादी ढांचा तेजी के साथ विकसित कर रहा

मोदी सरकार के कार्यकाल में सीमावर्ती राज्यों में बुनियादी ढांचे के विकास को खासी तेजी दी गई है। तमाम जानकारों का मानना है कि चीन की हालिया आक्रामकता की एक वजह यह भी थी। चीनी सेना की यह हरकत भारत को उकसाने की भी कोशिश हो सकती है, क्योंकि वह बराबरी का ओहदा हासिल करने के लिए प्रयासरत है। भारत केवल अपनी सीमा के दायरे में नहीं, बल्कि दूसरे देशों में भी बुनियादी ढांचा विकसित कर रहा है। ईरान का चाबहार बंदरगाह इसकी उम्दा मिसाल है। हालांकि भारत-ईरान द्विपक्षीय रिश्तों को धार देने के लिए इस पर सहमति तो 1970 के दशक में ही बन गई थी, लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों के दौर में काम लगातार टलता गया।

2018 में भारत ने चाबहार बंदरगाह का परिचालन अपने नियंत्रण में लिया

2018 में जाकर ही भारत ने इस बंदरगाह का परिचालन अपने नियंत्रण में लिया। तबसे वह होर्मुज जलसंधि जैसे रणनीतिक स्थान पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। हमारी विदेश नीति में इन घटनाओं के विश्लेषण से चाणक्य की रीति-नीति के मूलतत्व को तलाशा जा सकता है। एक चतुर रणनीतिकार के रूप में चाणक्य ने राजा को यही सलाह दी कि कोई भी देश अलग-थलग नहीं रह सकता और उसके लिए अपनी सीमाओं के परे भी अपने हितों की पूर्ति आवश्यक होती है। उसे चाहिए कि वह स्वयं को सामर्थ्यवान बनाकर लगातार पड़ोसियों पर ध्यान देता रहे।

एलएसी पर चीनी सैनिकों की ओर से हुई हिंसा में भारतीय सैनिकों ने अदम्य साहस का परिचय दिया

हाल में जब एलएसी पर चीनी सैनिकों की ओर से हिंसा हुई तो हमारे सैनिकों ने अद्भुत साहस और प्रतिरोध का परिचय दिया। पूरे देश ने पीएम मोदी में अपना विश्वास व्यक्त किया, क्योंकि उनमें उन्हें ऐसा नेता नजर आता है जो भारत की क्षेत्रीय अखंडता को लेकर कोई समझौता नहीं करेगा। अपने पूर्ववर्तियों से इतर मोदी ने बिगड़ैल पड़ोसियों के प्रति दृढ़ता दिखाई। वह शांति के भ्रामक संदेशों से संतुष्ट होने वाले नहीं।

मोदी की प्रखर कूटनीतिक रणनीति ने दी भारत को एक बड़ी ताकत

सीमा पर तनाव के दौरान उनके दो-टूक संदेश हों या फिर सैनिकों का हौसला बढ़ाने के लिए लद्दाख दौरे से यह स्पष्ट भी है। पीएम मोदी की प्रखर कूटनीतिक रणनीति ने स्पष्ट कर दिया कि भारत एक बड़ी ताकत है जिसे सम्मान देना होगा। भारत शांति चाहेगा और उसके लिए प्रयास भी करेगा, परंतु अपनी सीमाओं और संप्रभुता की रक्षा भी करेगा।

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