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सिंधिया और सचिन जैसे युवा चेहरों की बजाय कमलनाथ और गहलोत जैसे नेता ‘नेहरू-इंदिरा’ परिवार की पहली पसंद बनकर उभरे

देश की राजनीतिक व्यवस्था में सर्वाधिक समय तक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी शायद ही कभी इतनी दुविधा में रही हो, जितना हाल के कुछ वर्षों देखने को मिला है। पहली बात यह कि कांग्रेस को सत्ता से बाहर रहने का अभ्यास बहुत कम है। खासकर कांग्रेस की राजनीतिक धुरी बने ‘नेहरू-इंदिरा’ परिवार को तो सत्ता सुख से वंचित रहने का अभ्यास न के बराबर है। कई बार ऐसा लगता है कि मानो वे स्वीकार ही नहीं कर पा रहे हों कि जनता ने उन्हें सत्ता से विमुख रहने का जनादेश दिया है।

पुराने कांग्रेसियों के लिए तो यह परिवार भारत की राजनीति में ‘छुई-मुई’ की तरह है। इस परिवार से एसपीजी की सुरक्षा वापस लेने का मामला हो अथवा कानून सम्मत व्यवस्था में प्रियंका वाड्रा को दिए सरकारी बंगला छोड़ने के आदेश का विषय हो, हमेशा कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रताड़ना की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास करती है। जबकि राजनीति में यह सामान्य और रुटीन जैसी बातें हैं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं कि अनेक दिग्गज नेता पद जाने के बाद सरकारी सुविधाओं को बिना किसी शोर-शराबे के छोड़ते रहे हैं

कांग्रेस की आंतरिक समस्या: इन बातों का जिक्र इसलिए करना पड़ रहा है कि कांग्रेस की आंतरिक समस्याओं की अनेक जड़ें इसी भावना के इर्द-गिर्द नजर आती है। कहना कठिन है कि यह कांग्रेसियों की ‘नेहरू-इंदिरा’ परिवार के प्रति पूजनीय जैसी आस्था है या कोई मजबूरी कि वे इनके इतर न कुछ सोच पाते हैं और न देख पाते हैं। यहां तक कि सत्ता जाने के बाद भी इस परिवार को सत्ता सुख की सुविधाओं से वंचित होते नहीं देख पाते। यही कारण है कि कांग्रेस संगठन नेतृत्व के सवाल पर एक पेंडुलम की स्थिति में दो पालों की ठोकरें खा रही है। पहली बात तो नेतृत्व का सवाल उठाने की जहमत कोई पुराना कांग्रेसी करता नहीं और यदि किसी ने ऐसा कर भी दिया तो राहुल गांधी का विकल्प सोनिया गांधी और सोनिया गांधी का विकल्प राहुल गांधी तक सीमित होकर रह जाता है। विकल्प के तौर पर किसी नए चेहरे के रूप में सिवाय प्रियंका गांधी वाड्रा के अलावा किसी नाम की सुगबुगाहट भी नहीं आती।

चाहे मजबूरी हो या आस्था, किंतु वर्तमान कांग्रेस के भविष्य के लिए यह सबसे बड़े खतरे की तरह है। नेहरू-इंदिरा परिवार से बाहर की सोचने की लक्ष्मण रेखा लांघने का साहस पुराने कांग्रेसियों में नहीं दिखता। पुराने नेताओं की मजबूरी को एकबार समझ भी लें तो ‘नेहरू-इंदिरा’ परिवार के लोग भविष्य के नेतृत्व को उभारने को लेकर इतने बेपरवाह क्यों हैं? पिछले करीब छह वर्षों में सिर्फ एक बार 2018 के नवंबर-दिसंबर में ऐसा अवसर आया, जब कांग्रेस के लिए अच्छे दिन की आहट सुनाई दी।

कांग्रेस आलाकमान का चयन: मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को चुनावी बढ़त मिली, लेकिन शीर्ष नेतृत्व ने मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े और महत्वपूर्ण राज्यों में मुख्यमंत्री के चयन में नए और युवा चेहरों की बजाय उन पुराने नेताओं के हाथों सत्ता की कमान दी, जिनसे कांग्रेस के भविष्य की आस रखना पतझड़ के मौसम में हरियाली की उम्मीद लगाने जैसा था। ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट जैसे युवा चेहरों की बजाय कांग्रेस के कमलनाथ और गहलोत जैसे नेता ‘नेहरू-इंदिरा’ परिवार की पहली पसंद बनकर उभरे। कांग्रेस आलाकमान का यह चयन ही भविष्य के नेतृत्व के उभार के प्रति उनकी उदासीनता का परिचायक है। नए चेहरों की उपेक्षा का खमियाजा मध्य प्रदेश में कांग्रेस सत्ता गंवाकर भुगतना पड़ा। ज्योतिरादित्य सिंधिया अपनी लगातार हो रही उपेक्षा का घूंट जब तक पी सके, पीते रहे और जब पानी सिर से ऊपर बहने लगा तो उन्होंने पार्टी के कई विधायकों के साथ खुद को अलग कर लिया। वैसी ही स्थिति राजस्थान के युवा कांग्रेसी नेता और प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट के साथ भी बनी। सचिन पायलट ने भी बगावत कर दिया है। राजस्थान में भी अगर कांग्रेस की सरकार चली जाए तो आश्चर्य नहीं।

कांग्रेस नेतृत्व ने युवा चेहरों को आजमाने में चूक क्यों की?: युवा नेताओं की पुराने नेताओं से रार और एक बार फिर राहुल गांधी को अध्यक्ष के तौर पर आजमाने की कसरत के बीच यह सवाल भी मौजूं है कि कांग्रेस आलाकमान बिगड़ते राजनीतिक घटनाक्रमों को संभालने में नाकाम क्यों हो रहा? इस सवाल का जवाब कांग्रेस में होती टूट के लिए भाजपा को जिम्मेदार बताने से नहीं मिलेगा, यह कांग्रेस नेतृत्व की अपनी जिम्मेदारी है। जिन दो राज्यों में कांग्रेस में टूट का संकट दिखा है, उनको लेकर यह सवाल भी उठा कि कांग्रेस नेतृत्व ने युवा चेहरों को आजमाने में चूक क्यों की? इसको लेकर राजनीतिक विश्लेषकों के बीच कई मत हैं। एक मत यह भी है कि ‘नेहरू-इंदिरा’ परिवार और उसके इर्दगिर्द रहने वाले पुराने नेता युवा चेहरों को राहुल गांधी के लिए चुनौती के रूप में देखते हैं। इस तर्क में दम इसलिए भी है, क्योंकि अनेक अवसर मिलने के बावजूद राहुल गांधी एक सफल नेतृत्वकर्ता के रूप में खुद को प्रमाणिक तौर पर खरा साबित नहीं कर पाए हैं।

गत कई दशकों के इतिहास में राहुल गांधी इकलौते ऐसे नेता होंगे जिनको ‘लॉन्च’ करने का कई बार असफल प्रयास हुआ है। ऐसा प्रयास करने वाले कांग्रेस के शुभचिंतकों को अभी भी राहुल गांधी से आस है। कम से कम भविष्य की राजनीति के लिहाज से भारतीय जनता पार्टी की रीति-नीति से भी अगर कांग्रेस सीख लेती तो शायद उसको यह दिन नहीं देखना पड़ता। देखा जाए तो अटल-अडवाणी के दौर से लेकर मोदी-शाह के दौर तक भाजपा ने सत्ता मिलने पर नए नेतृत्व को अबाध ढंग से आगे बढ़ाया।

वर्ष 2000 के दौर में नरेंद्र मोदी, अरुण जेटली, राजनाथ सिंह, प्रमोद महाजन, उमा भारती सरीखे दूसरी कतार के नेता आगे बढ़ाए गए। आज आज उसी टीम के नेता भाजपा का नेतृत्व कर रहे हैं। वहीं 2014 में जब मोदी-शाह का दौर आया और राज्यों में भाजपा की सरकारें बनी तो भाजपा ने एक बार फिर राज्यों में नए नेतृत्व को तरजीह दी। यह भाजपा की भविष्योन्मुख दृष्टि को दिखाता है। कांग्रेस इस मामले में ‘वंशवादी’ सत्ता के लोभ से बाहर नहीं निकल पा रही है। कांग्रेस का यह आचरण वर्तमान की टूट का जिम्मेदार तो है ही भविष्य की नेतृत्व विहीनता की वजह भी बनेगा।

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