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कोविड-19 महामारी के चलते मोदी सरकार के समक्ष देश की अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती

 कोरोना वायरस से उपजी कोविड-19 महामारी और उससे निपटने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के कारण पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था संकट में आ गई है। भारत भी इस संकट से अछूता नहीं है। पहले महामारी पर काबू पाने के लिए लॉकडाउन को सख्ती से लागू किया गया, फिर अर्थव्यवस्था के पहिये को घुमाने के लिए उसे शिथिल करना शुरू किया गया। लॉकडाउन में तमाम छूट के बाद भी पहले जैसी स्थिति नहीं बनती दिख रही है। एक आकलन के अनुसार अभी साठ प्रतिशत अर्थव्यवस्था ही पटरी पर आ सकी है। एक तो होटल, मॉल, रेस्त्रां, मेट्रो, स्कूल आदि बंद पड़े हैं और दूसरे, महामारी के भय से लोग घरों से कम निकल रहे हैं।

कारोबारी यात्रा करने के बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग से काम चला रहे हैं

आवाजाही आर्थिक गतिविधियों को बल प्रदान करती है, लेकिन महामारी के भय से बहुत से लोग तकनीकी उपायों के जरिये घर से ही काम कर रहे हैं। इसी तरह तमाम कारोबारी यात्रा करने के बजाय वीडियो कांफ्रेंसिंग से काम चला रहे हैं। इसी कारण रेलवे ट्रेनों को पूरी क्षमता से चलाने की आवश्यकता नहीं महसूस कर रहा है। चूंकि हवाई यात्रा में छूट के बावजूद कारोबारी यात्राएं करने से बच रहे हैं इसलिए एयरलाइंस घाटे में चल रही हैं। घाटे से बचने के लिए वे अपने कर्मचारियों की संख्या कम करने में लगी हैं। पिछले दिनों ही इंडिगो एयरलाइंस ने अपने दस प्रतिशत कर्मचारियों की छंटनी कर दी ।

महामारी का प्रकोप न थमने के कारण सरकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर नहीं ला पा रही

हालांकि सरकार अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कई तरह के जतन कर रही है, लेकिन महामारी का प्रकोप न थमने के कारण उसकी कोशिश कारगर नहीं साबित हो रही है। माना जा रहा है कि भारत में इस महामारी का प्रकोप अभी और तेजी पकड़ेगा। हालांकि भारत में महामारी की चपेट में आने वालों की मृत्युदर कम है, लेकिन जहां दिल्ली जैसे शहरों में उसका असर कम हो रहा है वहीं देश के अन्य इलाकों में वह बढ़ता दिख रहा है। चिंता की बात यह है कि इनमें ग्रामीण इलाके भी हैं।

छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों का स्वास्थ्य ढांचा अपर्याप्त

राज्यों ने शुरुआत में कोरोना के संदिग्ध मरीजों की पहचान के लिए कहीं कम संख्या टेस्ट करके समस्या को बढ़ाने का ही काम किया है। यह ठीक है कि उन्हें गलती का अहसास हो गया, लेकिन इस पर गौर करने की जरूरत है कि बडे़ शहरों में तो सरकारी स्वास्थ्य ढांचा तो जैसे-तैसे इस महामारी का मुकाबला कर पा रहा है, लेकिन छोटे शहरों, कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों का स्वास्थ्य ढांचा अपर्याप्त साबित हो रहा है। यही कारण है कि लोगों में भय व्याप्त हो रहा है।

कोरोना के चलते राज्य सरकारों को अपने स्वास्थ्य ढांचे को सुधारना चाहिए

जहां लोगों को सावधानी बरतने की जरूरत है वहीं राज्य सरकारों को अपने स्वास्थ्य ढांचे को सुधारने पर काम करना होगा। कमजोर स्वास्थ्य ढांचे को लेकर आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति का कोई मतलब नहीं, क्योंकि उससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि महामारी के प्रसार के लिए कमजोर स्वास्थ्य ढांचे के साथ ही लोगों की लापरवाही भी जिम्मेदार है।

लोग शारीरिक दूरी को लेकर न तो सजग हैं और न ही मास्क का इस्तेमाल सही तरीके से कर रहे हैं

कोरोना वायरस का संक्रमण फैलने के खतरे के बाद भी लोग शारीरिक दूरी को लेकर सजग नहीं हैं। तमाम लोग तो मास्क का भी इस्तेमाल सही तरह नहीं कर रहे हैं। स्पष्ट है कि यह लापरवाही भारी पड़ रही है। बेहतर हो कि राजनीतिक दल महामारी को लेकर सस्ती राजनीति करने के बजाय आम लोगों को इसके लिए प्रेरित करें कि वे पर्याप्त सावधानी बरतें। राजनीतिक दलों को इसकी भी चिंता करनी चाहिए कि अर्थव्यवस्था पटरी पर कैसे आए?

कोरोना ने अर्थव्यवस्था को जो गहरा नुकसान पहुंचाया उसकी भरपाई लंबे समय तक नहीं हो पाएगी

यह तय है कि कोविड-19 महामारी ने अर्थव्यवस्था को जो गहरा नुकसान पहुंचाया है उसकी भरपाई लंबे समय तक नहीं हो पाएगी। महामारी के अलावा भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने एक अन्य चुनौती अतिक्रमणकारी चीन का रवैया भी है।

भारत को आर्थिक-व्यापारिक मामलों में चीन से दूरी बनाए रखना जरूरी

महामारी के बीच चीनी सेना ने लद्दाख की गलवन घाटी में जो हरकत की उसके बाद भारत के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह आर्थिक-व्यापारिक मामलों में उससे दूरी बनाए। देश के छोटे-बड़े कारोबारी संगठन चीन को सबक सिखाने के लिए उसके साथ व्यापार करने से तौबा कर रहे हैं। चीन के प्रतिकार का यही सबसे अच्छा तरीका है। यह अच्छा है कि तमाम छोटे कारोबारी चीन से जो कच्चा माल मंगाते थे उसे वे खुद तैयार करने पर जोर दे रहे हैं। यह जज्बा कायम रहना चाहिए।

भारत की तरह दुनिया के अन्य देश भी चीन से आर्थिक दूरी बना रहे हैं

खुद भारत सरकार भी चीनी कंपनियों पर लगाम लगा रही है। चीनी निवेश को नियंत्रित करने, उसके 59 एप्स पर पाबंदी लगाने के बाद भारत ने हाल में चीन की सरकारी कंपनियों से खरीद पर रोक लगाने का फैसला किया। भारत की तरह दुनिया के अन्य देश भी चीन से आर्थिक दूरी बना रहे हैं। इसका कारण यह है कि वे चीन को कोरोना वायरस के प्रसार के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं। इन देशों को चीन का विस्तारवादी रवैया और साथ ही उसकी मनमानी आर्थिक-व्यापारिक नीतियां भी रास नहीं आ रही हैं।

अमेरिका, यूरोप, जापान आदि की तमाम कंपनियां चीन से अपना कारोबार समेट रही हैं

अमेरिका, यूरोप, जापान आदि की तमाम कंपनियां चीन से अपना कारोबार समेट रही हैं। यह भारत के लिए एक अच्छा अवसर है, लेकिन अभी इसे सही तरह नहीं भुनाया जा पा रहा है। अभी तक चीन छोड़ने का इरादा जताने वाली इक्का-दुक्का कंपनियों ने ही भारत की ओर रुख किया है। ऐसे में यह जरूरी है कि भारत सरकार इन कंपनियों को आकर्षित करने के लिए उठाए जाने वाले कदमों में और तेजी लाए। कहीं ऐसा न हो कि ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से निकल कर वियतनाम, इंडोनेशिया और थाईलैंड आदि जाना पसंद करें।

भारत को चीन छोड़ने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करना होगा

चीन छोड़ने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने के साथ ही भारत को घरेलू कंपनियों को प्रोत्साहित करने पर भी नए सिरे से ध्यान देना होगा। इसकी भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि अमेरिका और यूरोपीय देशों के मुकाबले भारत ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए जो आर्थिक पैकेज घोषित किया उसे नाकाफी माना जा रहा है। इस पैकेज का वैसा असर नहीं पड़ा जैसी उम्मीद थी। इसी कारण जमीनी हकीकत बदल नहीं रही। कारोबारी समुदाय में यह जो आशा जगी थी कि इस पैकेज के साथ श्रम सुधारों के साथ अन्य लंबित सुधार भी आगे बढ़ेंगे, वह पूरी नहीं हुई।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी, पर शहरी अर्थव्यवस्था को पटरी पर आने में लगेगा समय

बेहतर मानसून ने इसकी संभावना अवश्य बढ़ाई है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था पटरी पर आ जाएगी, पर शहरी अर्थव्यवस्था के पटरी पर आने में समय लगेगा। शायद इसी कारण केंद्र सरकार कारोबार जगत के लिए नए सिरे से राहत देने के उपायों पर विचार कर रही है। उम्मीद है कि ये उपाय कारोबार जगत की उम्मीदों के अनुरूप होंगे और उनसे अर्थव्यवस्था को जल्द पटरी पर लाने में मदद मिलेगी।

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