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हर हद से परे है रामलला के प्रति अयोध्यावासियों का लगाव, भूमिपूजन पर घर पर दीप जलाएंगे बब्लू खान

अयोध्या। रामलला को लेकर देश-दुनिया के अलग-अलग धर्मावलंबियों की जो धारणा हो, पर अपनी नगरी अयोध्या में वे सबके दुलारे रहे हैं। अयोध्या की पहचान ही रामलला से है। राममंदिर निर्माण शुरू होने की पावन बेला में धर्म-पंथ से परे हर अयोध्यावासी उल्लसित और प्रमुदित है। वास्तव में रामलला ही अयोध्या की गंगा-जमुनी जीवनशैली के आधार हैं।

माना जा रहा है कि जन्मभूमि पर राममंदिर के बहाने अयोध्या की यह पहचानपहले से अधिक पुख्ता होगी। मिसाल के तौर पर मंदिर निर्माण शुरू होने की खुशी में उल्लास का अभियान चलाने वाले बब्लू खान हैं। भूमिपूजन के अवसर पर वे अपने घर पर 501 दीप रोशन कर खुशी मनाने की तैयारी में हैं। यह दीप वे अपनी जिला पंचायत सदस्य पत्नी इस्मत जहां के साथ रामनगरी से ही लगे ग्राम मिर्जापुर माफी स्थित आवास पर हाथ से ही बना रहे होते हैं। रामलला के प्रति उनका आदर दो-चार दिनों का ही नहीं है। उन्हें यह संस्कार विरासत में मिला। खान कहते हैं, उनका मजहब भी रामलला या अन्य किसी धर्म  के प्रतिनिधियों के आदर की सीख देता है.

करीब का हूं। सरयू से लगी उनकी धरती की मिट्टी की उपज हूं। हमारे पुरखे  भगवान राम के वंशज सूर्यवंशीय क्षत्रिय थे और हमें इस बात का सदैव से गर्व है कि हम भगवान राम जैसे आला किरदार हमारे पूर्वज थे। बब्लू खान ही क्यों कई ऐसे किरदार हैं, जिनका प्रभु राम से अपनापन किसी कहानी से कम नहीं है। देवरिया के दिग्गज सेठ मोहन बाबू एक शताब्दी पूर्व अपने भरे-पूरे कारोबार को तिलांजलि दे मां जानकी को बेटी और प्रभु राम को दामाद मान रामनगरी आ पहुंचे। 1942 में उन्होंने आज सांस्कृतिक-धार्मिक विरासत के अहम केंद्र के रूप में विद्यमान जानकीमहल मंदिर एवं धर्मशाला की स्थापना की। जानकीमहल का विशद् आध्यात्मिक परिकर आज भी रामलला को ‘दूल्हा सरकार’ मानकर उनके प्रति न्योछावर रहता है। मोहन बाबू के वंशज और जानकीमहल के विशाल सेवा और उपासना प्रकल्पों के प्रबंधन से जुड़े आदित्य सुलतानिया कहते हैं, संभव है कि हममें वैसा दृढ़ धार्मिक विश्वास न हो, पर रामलला से स्वयं के अलग होने की कल्पना करना भी बेमानी है। गुरुद्वारा ब्रह्मकुंड के मुख्यग्रंथी ज्ञानी गुरुजीत सिंह रामलला की ही छांव में बड़े हुए। वे कहते हैं, रामलला जीवन के हर पल बहुत निकट नजर आये हैं। होश  संभालने से लेकर उनकी पढ़ाई और उद्यमशीलता राममंदिर के साये में गुजरी

ही, पुरखों से भी रामलला से अभिन्नता का प्रसाद मिला। मान्यता है कि प्रथम, नवम एवं दशम गुरु रामलला के प्रति अनुराग के ही चलते अयोध्या

पहुंचे। दशम गुरु ने तो राममंदिर के लिए संघर्ष की प्रेरणा दी। कालांतर में गुरुद्वारा के पूर्वववर्ती महंत भी मंदिर के लिए चले संघर्ष में शामिल हुए। ज्ञानी गुरुजीत सिंह स्वयं मंदिर आंदोलन के प्रमुख सहयोगियों में रहे हैं। तिवारी मंदिर के संस्थापक एवं डेढ़ शताब्दी पूर्व अयोध्या की दिग्गज आध्यात्मिक विभूति के रूप में स्थापित रहे पं. उमापति त्रिपाठी भी रामलला के प्रति अपनत्व की चमत्कारिक मिसाल हैं। भक्तमाल जैसे ग्रंथ और स्थानीय परंपरा के अनुसार भगवान ने एक बार अपनी लीला से यह जताया कि पं. उमापति को वे अपना गुरु मानते हैं। इसी के चलते उन्हें भगवान राम के सूर्यवंशीय नरेशों के त्रेतायुगीन गुरु वशिष्ठ का अवतार भी माना जाता है।

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