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पायलट-राहुल की मुलाकात से कांग्रेस का राजस्थान संकट सुलझ सकता है, मुख्यमंत्री गहलोत से होंगे मतभेद दूर

बगावत की राह पर चल रहे सचिन पायलट की राहुल गांधी से मुलाकात के बाद कांग्रेस का राजस्थान संकट सुलटता तो दिख रहा है, लेकिन जब तक ऐसा हो न जाए तब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता। इस संकट की जड़ में केवल राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री पद से हटाए गए सचिन पायलट के बीच के मतभेद ही नहीं हैं, बल्कि कांग्रेस नेतृत्व की निर्णयहीनता भी है। इसी निर्णयहीनता के चलते दोनों नेताओं के मतभेद इस हद तक बढ़े और गतिरोध जरूरत से ज्यादा लंबा खिंचा।

कांग्रेस नेतृत्व किस कदर निर्णयहीनता से ग्रस्त है, इसका प्रमाण इससे मिलता है कि सोनिया गांधी को अंतरिम अध्यक्ष बने एक वर्ष हो गया है और फिर भी इसका फैसला नहीं हो पाया है कि अगला अध्यक्ष कौन बनेगा और कब? एक साल बाद भी कांग्रेस के अगले अध्यक्ष के बारे में कोई फैसला न हो पाना यही बताता है कि पार्टी को कामचलाऊ व्यवस्था से कोई गुरेज नहीं। यदि अंतरिम अध्यक्ष के तौर पर सोनिया गांधी पार्टी का संचालन करने में समर्थ हैं तो फिर वह अध्यक्ष ही क्यों नहीं बन जातीं? हैरानी नहीं कि वह इसलिए अंतरिम अध्यक्ष बनी रहना चाहती हों ताकि राहुल गांधी बिना जिम्मेदारी लिए पिछले दरवाजे से पार्टी का संचालन करते रहें। वह ऐसा कर रहे हैं, इसकी पुष्टि उनसे सचिन पायलट की मुलाकात से तो होती ही है, पार्टी के अन्य फैसलों से भी होती है।

यदि राहुल गांधी पार्टी का संचालन करना चाहते हैं तो क्या यह उचित नहीं होगा कि वह फिर से अध्यक्ष पद पर आसीन हो जाएं, जैसा कि कुछ कांग्रेसी नेता चाह रहे हैं और इसकी मांग भी कर रहे हैं? क्या ऐसा इसलिए नहीं हो रहा है कि इस सवाल का जवाब देना कठिन होगा कि अगर उन्हें अध्यक्ष पद पर विराजमान होना ही था तो फिर उसका परित्याग क्यों किया? कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गांधी बिना जिम्मेदारी लिए काम करना बेहतर समझ रहे हों?

इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस गांधी परिवार का पर्याय बनकर रह गई है। जो कसर रह गई थी वह प्रियंका गांधी वाड्रा के महासचिव बनने से पूरी हो गई है। यह ठीक है कि कांग्रेस का गांधी परिवार के बगैर गुजारा नहीं, लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं हो सकता कि वह एक परिवार की निजी जागीर बनकर रह जाए या फिर उसे प्राइवेट लिमिटेड की तरह चलाया जाए। ऐसा करने से गांधी परिवार और उसे ही पार्टी मानने वाले कांग्रेसी नेताओं के किन्हीं स्वार्थो की पूíत हो सकती है, लेकिन कांग्रेस की राजनीतिक जमीन मजबूत नहीं हो सकती।

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