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बदलनी होंगी स्वास्थ्य क्षेत्र की प्राथमिकताएं: आम जनता की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार किया जाना आवश्यक

कोविड-19 महामारी का असर कम होता नहीं दिख रहा है। पिछले कुछ दिनों से देश भर में करीब साठ हजार कोरोना मरीज प्रतिदिन सामने आ रहे हैं। नमन है उन डॉक्टरों को जो महामारी का रूप धारण कर चुकी इस बीमारी से लड़ने में लगे हुए हैं। इस बीमारी को फैलाने वाले कोरोना वायरस का टीका और साथ ही कोई सटीक दवा उपलब्ध न होने के कारण समस्या बढ़ रही है। चूंकि इस महामारी के खिलाफ लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही कारगर साबित हो रही है इसलिए उसे बढ़ाने वाले उपायों पर जोर दिया जाना चाहिए। कोई रोग और खासकर संचारी रोग फैलने के बाद उसका उपचार करने से बेहतर है कि रोग को फैलने ही न दिया जाए। यह तब संभव होगा जब जनता की रोग प्रतिरोधक क्षमता में सुधार किया जाए। इसके लिए स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च की विषमता पर ध्यान दिया जाना आवश्यक है

स्वास्थ्य में आम आदमी की तुलना में सरकारी कर्मियों पर अधिक खर्च

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी एक आंकड़े के अनुसार वर्ष 2015-16 में सरकारी कर्मियों के उपचार पर 9,134 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिससे 31 लाख कर्मी लाभान्वित हुए। उनके परिवार को भी गिन लें तो 1.5 करोड़ लोग लाभान्वित हुए। इन पर 61,007 रुपये प्रति व्यक्ति सरकार ने खर्च किए। इसकी तुलना में आम जनता पर सरकार द्वारा 38,794 करोड़ रुपये खर्च किए गए। इस हिसाब से प्रति व्यक्ति केवल 296 रुपये का खर्च किया गया। सरकार द्वारा किए गए स्वास्थ्य खर्च में आम आदमी की तुलना में सरकारी कर्मियों पर अधिक खर्च किया जा रहा है। विचारणीय प्रश्न यह है कि सेवक पर अधिक और सेवित पर न्यून खर्च क्यों?

2020-21 के बजट में एलोपैथी के लिए 63,000 करोड़, आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी के लिए 2,100 करोड़

वर्ष 2020-21 के बजट में एलोपैथी के लिए केंद्र सरकार द्वारा 63,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जबकि आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी आदि आयुष पद्धतियों के लिए केवल 2,100 करोड़ रुपये दिए गए। ये पद्धतियां उपचार कम और संपूर्ण स्वास्थ्य पर अधिक ध्यान देती हैं जबकि एलोपैथी उपचार पर केंद्रित रहती है। उच्च तकनीक के उपचार जैसे हृदय में स्टंट डालना इत्यादि पर कहीं अधिक पैसा खर्च हो रहा है।

उच्च तकनीक वाले उपचार पर सरकार का 28 फीसद खर्च

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के एम गोविंद राव द्वारा प्रकाशित एक पत्र के अनुसार उच्च तकनीक वाले उपचार पर सरकार का 28 प्रतिशत खर्च होता है, जबकि सरकार द्वारा ही प्रकाशित राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार यह मात्र दस प्रतिशत होना था। इन दोनों विसंगतियों यानी एलोपैथी और उच्च तकनीक वाले उपचार में अधिक खर्च किए जाने के पीछे ऐसा लगता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्वार्थ इन खर्चों से पोषित होते हैं। एक धारणा है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के हितों को साधने के लिए एलोपैथी में और उसमें भी उच्च तकनीक वाले उपचार पर ज्यादा पैसे खर्च किए जा रहे हैं। जो भी हो, यह एक समस्या तो है ही कि बजट का एक बड़ा हिस्सा सरकारी कर्मियों के वेतन में खप जाता है।

एमपी और ओडिशा में बजट का 83 फीसद कर्मियों के वेतन में व्यय होता है 

गोविंद राव के अनुसार मध्य प्रदेश और ओडिशा में बजट का 83 प्रतिशत कर्मियों के वेतन में व्यय हो जाता है, जबकि स्वास्थ्य कर्मियों के पास दवा नहीं रहती और स्वास्थ्य व्यवस्था निष्प्रभावी नजर आती है। इन समस्याओं के निवारण के लिए सरकार को तीन कार्य करने चाहिए। नीति आयोग के सलाहकार राकेश सरवाल के अनुसार केंद्र सरकार के कर्मियों के लिए चलाई जा रही सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ सर्विस को सर्वव्यापी स्वास्थ्य सेवा में परिवर्तित कर देना चाहिए, ताकि आम जनता को केंद्र सरकार के कर्मियों जैसी स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध हो। दूसरा काम यह किया जाना चाहिए कि एलोपैथी एवं उच्च तकनीक वाले उपचार के आवंटन में कटौती करके सामान्य उपचार पर खर्च बढ़ाना चाहिए। तीसरा कार्य यह होना चाहिए कि सरकारी कर्मियों के वेतन और दवा के खर्च में एक अनुपात निर्धारित कर देना चाहिए।

टीकाकरण से हम कोविड जैसे संक्रामक रोगों को रोक सकेंगे, इस पर संदेह है

कोविड-19 के साथ-साथ अन्य रोगों का सामना करने में पहला विषय टीकाकरण का है। समस्या यह है कि कोरोना वायरस अपना रूप शीघ्र बदल रहा है। यदि इसे रोकने के लिए हमने टीका बना भी लिया तो कल वह उपयोगी होगा, इसकी गारंटी नहीं है। एक समस्या यह भी है कि हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था टीकाकरण में लचर है। गोविंद राव के अनुसार दक्षिण अमेरिका में चेचक के टीके से केवल 7 फीसद बच्चे वंचित रहते हैं, जबकि भारत में करीब 30 फीसद वंचित रह जाते हैं। इसलिए टीकाकरण से हम कोविड जैसे संक्रामक रोगों को रोक सकेंगे, इस पर संदेह है।

लोग रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करें और योग, व्यायाम करें तो हालात बदल सकते हैं

प्रतिरोधक क्षमता का संबंध लोगों की जीवनशैली से है। यदि लोग रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि करने वाले खाद्य पदार्थों का सेवन करें और इसके साथ ही ध्यान, योग, व्यायाम करें तो हालात बदल सकते हैं। सरकार ने आयोडीन युक्त नमक और नवजात शिशुओं को माताओं द्वारा स्तनपान कराए जाने के सफल अभियान चलाए हैं। इसी प्रकार उसे बेहतर जीवन शैली अपनाने का अभियान चलाना चाहिए।

कोरोना वायरस के सामुदायिक फैलाव की आशंका, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपायों पर ध्यान दें

तीसरा विषय सामाजिक है। उत्तर प्रदेश सरकार की वेबसाइट पर वैद्य वाचस्पति त्रिपाठी के हवाले से बताया गया है कि नदी में तमाम श्रद्धालुओं के स्नान करने से उनके शरीर में विद्यमान विभिन्न रोगों के बैक्टीरिया एवं वायरस नदी के पानी में सूक्ष्म मात्रा में फैल जाते हैं। दूसरे स्वस्थ व्यक्ति जब उसी पानी में स्नान करते हैं तो ये बैक्टीरिया और वायरस उनके शरीर में प्रवेश करते हैं और रोगों के प्रति उनकी प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते हैं। चूंकि कोरोना वायरस के सामुदायिक फैलाव की आशंका बढ़ रही है इसलिए प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के उपायों पर ध्यान दिया ही जाना चाहिए।

टीकाकरण, जांच इत्यादि में मात्र 12 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए

आयुष मंत्रालय की सहमति से सरकार उन उपायों की व्यवस्था कर सकती है जो रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत करने में सहायक हों। जैसा कि ऊपर बताया गया कि 2015-16 में केंद्र सरकार द्वारा आम जनता पर 38,794 करोड़ रुपये खर्च किए गए। टीकाकरण, जांच इत्यादि में मात्र 12 हजार करोड़ रुपये खर्च किए गए।

रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाकर 50 फीसद करना चाहिए

इसका मतलब है कि रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले उपायों पर लगभग 30 प्रतिशत खर्च किया जा रहा है। इसे बढ़ाकर 50 प्रतिशत करना चाहिए। ऐसा करने से जनता की सभी रोगों से लड़ने की क्षमता का विस्तार होगा। इस सुझाव को लागू करने में समस्या बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वार्थ है। सरकार को सोचना होगा कि वह बहुराष्ट्रीय कंपनियों के मेडिकल उत्पादों की बिक्री से जीडीपी बढ़ाएगी अथवा जनता को रोगमुक्त बनाकर? उसे अपनी प्राथमिकता तय करनी चाहिए, क्योंकि सेहत का सीधा संबंध आर्थिक विकास से है।

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