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मां की सिफारिश राहत इंदौरी को मिला था पहला मुशायरा, जानें किताब के बहाने यादों के पुराने दौर का सफर

इंदौर। जीवन में कई ऐसे पल होते हैं जिनके बारे में दिल और खुदा के सिवाय सिर्फ वही जानता है जिसका रिश्ता उन पलों से रहा हो। ये पल कभी तो अकेले में मुस्कराने की वजह दे जाते हैं तो कभी महफिल में भी गमों का सैलाब छोड़ जाते हैं। राहत इंदौरी के जीवन की किताब के पन्नों पर ऐसे अनेक रंग थे जिन्हें उन्होंने कभी छुपाया तो कभी अपनों से बयां किया। जिन्हें अपनों से उन्होंने बयां किया, उन्हीं पलों को उनकी ही जुबानी हम आप तक पहुंचा रहे हैं। पेश है राहत इंदौर पर लिखी किताब के कुछ अंश..

मां मेरी बात टाल नहीं सकी

मां को मैं पसंद था, लेकिन उन्हें मेरा शायरी करना पसंद नहीं था। असल में उन्हें शायरी ही पसंद नहीं थी। फिर भी उन्होंने ही मुझे पहला मुशायरा दिलवाया। बात देवास, मध्‍य प्रदेश की है। उन दिनों वहां हिंद मुशायरा होता था। उसमें देश के नामी शायर तशरीफ ला रहे थे। उस मुशायरे के आयोजक मेरे मामूं अब्दुल हकीम हनफी थे। वह देवास नगर निगम में ही थे और मुशायरा नगर निगम ही करा रहा था। मां से मैंने कहा कि यदि आप मामूं से मेरे मुशायरे में जाने की सिफारिश कर देंगी तो वह आपकी बात टालेंगे नहीं और मुझे मौका मिल जाएगा। मैं मां की कमजोरी था और वह मेरी बात टाल न सकीं। उन्होंने मामूं से मेरी सिफारिश की और मुझे मौका मिल गया।

तुम्हारी गजल तरन्नुम की मोहताज नहीं

शायरी की दुनिया में मेरा सफर नूर इंदौरी के जिक्र के बिना अधूरा है। नूर इंदौरी से मेरी पहली मुलाकात उन दिनों हुई, जब मैं देवास में नाकामयाब हो रहा था। सालों तक मैं मुशायरा नहीं पढ़ सका। केसर साहब के साथ मेरी मित्रता थी और उनके पास इंदौर के तकरीबन सभी शायर आते थे। वहीं मेरी मुलाकात नूर इंदौरी से हुई। भुसावल में मुशायरा था और मैं भी वहां मुशायरा पढ़ने गया। मैं तरन्नुम में पढ़ता था।

जब उसी अंदाज में गजल पढ़ी तो कोई खास दाद नहीं मिली। दूसरी गजल सादगी से पढ़ी और मुझे भरपूर दाद मिली। तब कृष्ण बिहारी नूर, खुमार बाराबंकवी और शमीम जयपुरी ने मुझसे कहा कि तुम्हारी शायरी को तरन्नुम की जरूरत नहीं। इसी आयोजन में कृष्ण बिहारी नूर ने मुझसे मुंबई चलने का कहा और मैं साथ हो लिया। कृष्ण बिहारी नूर का जश्न शुरू हुआ जिसमें बशीर बद्र मुशायरे की निजामत कर रहे थे। मैंने यहीं पहली गजल पढ़ी और फिर क्या था चारों तरफ वाहवाही हो गई। इसके बाद सिलसिला चल पड़ा।

मैंने रानीपुरा को ही दिल्ली माना

मेरी जिंदगी के पन्नों से रानीपुरा की बात, वहां की याद को साफ नहीं किया जा सकता। रानीपुरा की यह खूबी है कि वहां संजीदा अदब भी शामिल था तो अदबी शरारतें भी कम नहीं हुई। मैं जब भी दिल्ली जाता था, वहां के मेरे शायर दोस्त कहते थे कि अब आप दिल्ली में ही बस जाएं। गालिब से लेकर तमाम शायरों ने दिल्ली को दिल दिया। यह तो अदब का मरकज है। यहां रहकर शायरी की खिदमत की जा सकती है और यहीं से दूर-दूर तक पहुंचा जा सकता है। पर इंदौर को सहज भाव से छोड़ देना मेरे लिए आसान नहीं था। जब भी मुझे कोई दिल्ली में रहने के लिए कहता तो मैं उन्हें एक शेर सुना देता था कि ‘मेरी दिल्ली मेरा रानीपुरा है, गली में कुछ सुखनवर बैठते हैं।

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