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वॉट्सएप की दुनिया: वॉट्सएप ने बिखरे-टूटे रिश्तों को जोड़ने का काम किया, दूर बैठे लोगों को करीब लाया

रोजी-रोटी के चक्कर ने चौपाल और चबूतरों पर जमने वाली बैठकों को न जाने कब खत्म कर डाला था। लोग घर-परिवार के करीबी रिश्तों को छोड़कर बाकी रिश्तेदारों और दोस्तों से दूर हो चुके थे। सालों में कभी किसी शादी-विवाह के मौके पर मिलते तो पहचानना भी कठिन होता था।

वॉट्सएप ने बिखरे-टूटे रिश्तों को जोड़ने का काम किया, दूर बैठे लोगों को करीब लाया

तभी वॉट्सएप का प्रादुर्भाव हुआ। इसने बिखरे-टूटे रिश्तों को जोड़ने का काम किया, दूर बैठे लोगों को करीब लाया। शुरुआत में लोग एक-दूसरे का नंबर जुगाड़कर हेलो हाय, गुड मॉर्निंग तक सीमित थे, फिर कॉलिंग और वीडियो कॉलिंग का आनंद लेने लगे। यह वरदान साबित होने लगा। इसके बाद चौपाल और बैठकों का दौर शुरू होने लगा यानी ग्रुप्स बनने शुरू हो गए। जिस तरह म्यूजिक ग्रुप, डांस ग्रुप होते हैं वैसे ही वॉट्सएप ग्रुप। रिश्तों की तरह ग्रुप को संभालना भी मुश्किल है-मायके का ग्रुप, ससुराल का ग्रुप, सोसायटी का ग्रुप, दोस्तों का ग्रुप, ऑफिस का ग्रुप

दुनिया ग्रुप्स में सिमट गई, समर्पित लोगों ने ग्रुप्स की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली

कुछ लोगों की दुनिया इन ग्रुप्स में ही सिमट गई है। जिस तरह पुराने लोग अपने परिवार को एक रखने के लिए मेहनत करते थे और त्याग का भाव रखते थे उसी तरह कुछ समर्पित लोगों ने ग्रुप्स की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली है और दस-दस ग्रुप्स के एडमिन बन गए हैं। वे यह भी बताते रहते हैं कि उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रखी है। वे इस जिम्मेदारी के बोझ से दबे भी नजर आते हैं।

‘निंदक नियरे राखिये’ की भूमिका वाट्सएप ग्रुप निभाते हैं

आजकल ‘निंदक नियरे राखिये’ की भूमिका ये वाट्सएप ग्रुप ही निभाते हैं। इधर-उधर के मैसेज से लेकर घर की लड़ाइयां तक यहां फॉरवर्ड होती हैं। ग्रुप एडमिन किसी कबीले के सरदार की तरह होता है। शुरू में वह इस भूमिका को बड़ी लगन से निभाता है। नियम-संयम से रहना सिखाता है। कई बार लाठी भी भांजता है, फिर ग्रुप उसके हाथों से रेत की तरह फिसलने लगता है और वह जनता-जनार्दन के अनुसार चलने लगता है। इन ग्रुप्स पर लोग भी चार तरह के होते हैं। एक वे जो हमेशा खिले-खिले और एक्टिव रहते हैं, दूसरे रिबेल टाइप जो हर गलत बात का विरोध करते हैं या फिर सही बात में भी गलत खोज लेते हैं। तीसरे हां में हां मिलाने वाले होते हैं और चौथे सबसे खतरनाक। वे स्लीपर सेल की तरह होते हैं, जो कुछ बोलते नहीं, कुछ पोस्ट नहीं करते, पर ग्रुप की खबरें और स्क्रीन शॉट बाहर शेयर करने का शुभ काम उन्हीं के हाथों होता है।

कविता-कहानी, व्यंग्य के भी ग्रुप बनने लगे हैं

कविता-कहानी, व्यंग्य के भी ग्रुप बनने लगे हैं। कुछ तो परिवार की तरह स्मूथ चलते हैं और कुछ के एडमिन खुद को बाकायदा महाराजा समझते हैं। उनकी आज्ञा के बिना ग्रुप पर कोई चूं भी नहीं कर सकता। सब कुछ वही तय करते हैं। किसकी रचना लगेगी, किस विषय पर बात होगी। कौन नया मेंबर बनेगा और किसे निकाला जाएगा, यह सब वही तय करते हैं। वे बार-बार यह भी जताते हैं कि वे ग्रुप एडमिन हैं कोई साधारण मनुष्य नहीं। उनकी मर्जी पर निर्भर होता है कि किस रद्दी रचना को वे कालजयी का खिताब देंगे। वे चाहें तो सारे लेखकों को भेड़ समझकर हांकने लगें। लेखक बेचारे भी ग्रुप से निकाले जाने के डर से चुपचाप तमाशा देखते रहते हैं। जैसे गुरु बिन गति नहीं होती वैसे ही बिना ग्रुप भी कोई गति नहीं है।

संपादक लेखकों को अहसास कराता है कि तेरी रचना में तो दम ही नहीं था

यदि गलती से लेखक के साथ संपादक भी ग्रुप पर आ जाए तब तो मंदिर जैसी फीलिंग होने लगती है। संपादक भी ईश्वर जैसा महसूस करता है और लेखकों को अहसास कराता है कि तेरी रचना में तो दम ही नहीं था। अपनी कलम की धार से मैंने उसमें जान डाली। फिर शुरू होता है आरती और दीपदान का दौर।

जिनका छपता है वे आल्हा-उदल गाते हैं। जिनका नहीं छपता वे खुंदक खाते हैं

जिनका छपता है वे आल्हा-उदल गाते हैं। जिनका नहीं छपता वे खुंदक खाते हैं। यह सब देखकर इक्का-दुक्का स्वाभिमानी टाइप लेखकों को ठेस लगती है। वे या तो दूरी बना लेते हैं या आवाज उठाते हैं। जब उनकी आवाज को कोई सपोर्ट नहीं करता तो अपना ग्रुप बना लेते हैं और पुराना ग्रुप उसी तरह चलता रहता है जैसे पहले चलता होता था।

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