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विकसित करनी होगी स्वच्छता की संस्कृति, शहरी समाज गंदगी के मसले को बर्दाश्त करने का अभ्यस्त हो गया

हर साल के दौरान ऐसे पड़ाव अवश्य आते हैं जब मुख्यधारा के मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक कुछ सिलसिले स्वयं को दोहराते दिखते हैं। जैसे प्रचंड गर्मी और कड़कड़ाती सर्दी के दौरान विमर्श की धुरी ग्लोबल र्वांिमग और विषम मौसमी परिस्थितियों पर टिकी होती है। दीवाली के आसपास वायु प्रदूषण के कारण और निवारण पर मंथन होता है। इस बीच मानसून के दौरान विमर्श जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर केंद्रित हो जाता है। इसमें लोगों द्वारा हताश होकर कुंठित भाव से अपने अव्यवस्थित शहरी बुनियादी ढांचे और निम्न स्तरीय स्वच्छता के परिदृश्य पर खीझ की अभिव्यक्ति होने लगती है

बदहाल शहरी ढांचा और गंदगी का मसला

यह विषम चक्र इस तरह निरंतर चलता रहता है कि आम आदमी सुधारवादी प्रयासों के अस्तित्व को लेकर ही संशय में पड़ जाता है। बहरहाल जलवायु परिवर्तन का पेचीदा मसला और मौजूदा कोविड महामारी के निदान जैसे विषय भले ही आम समझ से परे हों, लेकिन बदहाल शहरी ढांचा और गंदगी का मसला भ्रमित और आक्रोशित अवश्य करता है। ऐसी स्थिति में कुछ संवेदनहीन म्युनिसिपल संस्थाओं के समक्ष रुदन के बजाय कुछ आधारभूत बिंदुओं पर चर्चा अधिक उपयोगी होगी।

बरत में पोल खोलती शहर के नाले और नालियां

इसकी शुरुआत बाबा आदम के जमाने वाले निकासी तंत्र के साथ करते हैं। प्रत्येक भारतीय शहर में कई किलोमीटर लंबे खुले ड्रेन यानी नाले या नालियां हैं। जब उनका निर्माण हुआ तबसे इन शहरों की आबादी 40 से 50 गुना तक बढ़ गई है। उस पुराने ढांचे में किसी आधुनिक परिवर्तन-संशोधन के अभाव में एक मामूली बरसात ही उनकी पोल खोलकर रख देती है। महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि आखिर इन नाले-नालियों में बहता क्या है? यदि ये अपने मूल स्वरूप में वर्षा जल या अधिशेष पानी की निकासी का माध्यम बने रहते तो संभवत: इतनी परेशानी न होती। वह पानी भले ही साफ न हो, लेकिन कम से कम अपशिष्ट तो न होता। यहां समग्र वास्तविकता बहुत घिनौनी है।

शहरों में सीवेज नेटवर्क समस्या: नदियों में गिरता नालों का गंदा पानी

हमारे शहरों में सीवेज नेटवर्क समस्या के दो पहलू हैं। इन शहरों के लिए यह किसी कलंक से कम नहीं कि अब भी तमाम इलाकों में सीवेज लाइन नहीं है। शहरों के जिन बड़े हिस्सों में सीवेज लाइन हैं भी तो उनमें से अधिकांश सीवेज शोधन संयंत्रों से जुड़ी हुई नहीं हैं। सीवेज शोधन क्षमता भी अपेक्षित स्तर के आधे से भी कम है। परिणामस्वरूप शहरों के बीचोंबीच कई किमी लंबे इन नालों में मल-मूत्र प्रवाहित होता है। इनमें से अधिकांश हमारी पवित्र नदियों में गिरते हैं।

गंदगी से भरे सीवेज स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा

‘नमामि गंगे’ और ऐसी ही तमाम योजनाओं के तहत सरकार ऐसे शोधन संयंत्रों में निवेश कर रही है, जहां नालों का पानी नदी में गिरने से पहले साफ किया जा सके। इससे नदियों का पानी शायद साफ हो जाए और पानी की गुणवत्ता में थोड़ा सुधार हो, लेकिन गंदगी से भरे ये सीवेज हमारे शहरों के बीचोंबीच कायम रहकर स्वास्थ्य के लिए एक बड़ा खतरा बने रहेंगे। आखिर संपूर्ण शहर के लिए सीवेज शोधन संयंत्र की व्यवस्था करना कितना मुश्किल और खर्चीला है? वास्तव में स्वच्छ परिवेश के लिए यह अनिवार्य शर्त है कि खुले नालों में गिरने से पहले समूचे सीवेज को इन संयंत्रों के रास्ते से गुजारा जाए। इसके अभाव में क्या मौजूदा हालात हमें यह सोचने पर विवश नहीं करते कि खुले में शौच से मुक्ति के दावे न केवल संदिग्ध, बल्कि अतिरंजित भी हैं?

खुले नालों को ढकने की योजना बनानी होगी

खुले नालों को लेकर कुछ और प्रश्न उठते हैं। आखिर उन्हें खुला छोड़ा ही क्यों जाना चाहिए? जब तक नाले खुले आसमान के नीचे बहते रहेंगे तब तक सीवेज शोधन संयंत्रों के चालू रहने के बावजूद वे एक बड़े डस्टबिन के रूप में मौजूद रहेंगे, जिनमें गंदगी और कचरा अपना रास्ता तलाशते रहेंगे। इनमें गिरने से लोगों की त्रासद मौत भी होती रही है। ऐसे में हमें इन्हें ढकने की योजना बनानी होगी। इसमें भारी-भरकम लागत जरूर आएगी, लेकिन उससे उपलब्ध होने वाली जमीन के मूल्य और उपयोगिता से उसकी भरपाई भी हो जाएगी। इस जमीन पर पार्किंग, पार्क और तहबाजारी जैसे तमाम प्रयोजन सिद्ध किए जा सकते हैं। इससे नियोजित विकास की अवधारणा को नया आयाम मिलेगा।

स्थानीय निकायों के लिए कचरा प्रबंधन महत्वपूर्ण चुनौती

इसके अलावा स्थानीय निकायों के लिए कचरा प्रबंधन एक और महत्वपूर्ण चुनौती है। इसके तहत उन्हें प्रत्येक घर से कचरा इकट्ठा कराने, उसे अलग-अलग हिस्सों में बांटने और उसके उचित निपटान की ठोस योजना बनानी होगी। हमारे शहर अभी भी कचरा निपटान संयंत्रों की बाट जोह रहे हैं। स्थानीय निकाय घरों से कचरा इकट्ठा करने में सक्षम नहीं हो सके हैं। ऐसे में खाली जगह या सड़क किनारे कूड़ा-कचरा फेंके जाने के दृश्य बेहद आम हैं। वहीं कचरा ढोने वाली गाड़ियां जितना कूड़ा ले जाती हैं, उससे अधिक गिराती जाती हैं।

जिम्मेदारी के प्रति लापरवाही

हमारी शहरी जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है। ‘भारत गांवों में निवास करता है’ वाली कहावत जल्द ही अप्रासंगिक हो जाएगी, जब हमारी आधी से अधिक आबादी शहरों में रहने लगेगी। स्वाभाविक है कि स्वच्छता की चुनौती भी इसके साथ और विकराल होती जाएगी। वास्तव में स्वच्छता मानक सभी पक्षों के सक्रिय सहयोग से ही सुधर सकते हैं। इसके अतिरिक्त वर्षों से जमा मलिनता को दूर करने के लिए भी सामुदायिक एकीकरण की आवश्यकता होगी। यह सुनिश्चित करना भी तो जनप्रतिनिधियों की ही जिम्मेदारी है। जहां तक हमारी अपेक्षाओं की बात है तो उसमें संसाधनों का अभाव एक बाधा हो सकती है। हालांकि यह समस्या अभाव की नहीं स्वभाव की अधिक प्रतीत होती है। यह जिम्मेदारी के प्रति लापरवाही अधिक है।

‘दुर्गंध’ जैसे शब्द हमारे शब्दकोश में छा गए 

एक सौंधी खुशबू की याद दिलाता हूं जब बारिश की बूंदें तपती हुई धरती पर गिरकर मिट्टी को महका देती हैं। एक पीढ़ी शायद उस अनुभव के लिए तरसेगी। कोई हैरानी नहीं कि ‘दुर्गंध’ जैसे शब्द हमारे शब्दकोश में छा गए हैं। ऐसे में प्रलय के लिए क्या हमें किसी कृत्रिम वायरस की दरकार है? हमारी आंतरिक मलिनता ही तो हमारे लिए अभिशाप नहीं बन जाएगी?

समाज गंदगी बर्दाश्त करने का अभ्यस्त हो गया

प्रतीत होता है कि हमारा समाज गंदगी बर्दाश्त करने का अभ्यस्त हो गया है। कचरा फैलाना और नियमों की अवहेलना जारी है। हमें आत्मविश्लेषण करना होगा कि क्या हम अपना दायित्व निभा रहे हैं? हम समस्या का हिस्सा बन रहे हैं या समाधान का? वास्तव में हमारी इच्छाएं ही हमारे चरित्र को अभिव्यक्त करती हैं। एक राष्ट्र के तौर पर हम सभी स्वच्छ शहर, स्वस्थ समाज और स्वास्थ्यप्रद वातावरण की कम से कम कामना तो करें।

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