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जिस ‘आजाद कश्मीर’ का ढोल पाकिस्तान सरकार पीटती है, वह कश्मीर का नहीं, बल्कि जम्मू का हिस्सा है

पिछले छह-सात दशकों में मीडिया ने भारतीय जनमानस पर खबरों की जितनी बमबारी कश्मीर को लेकर की है, उतनी शायद किसी और विषय पर नहीं की। इसके बावजूद यह देखकर हैरानी होती है कि हमारा मीडिया और भारत सरकार जनता तक यह बात पहुंचाने में असफल रही कि पाकिस्तानी कब्जे वाले जिस तथाकथित ‘आजाद-कश्मीर’ के सपने दिखाकर भारत के कश्मीरी अलगाव, आतंक और हिंसा का माहौल बनाए हुए हैं, वहां की जनता पाकिस्तानी तानाशाही में कैसे जी रही है

‘आजाद कश्मीर’ कश्मीर का नहीं, बल्कि जम्मू का हिस्सा है

देश और दुनिया को यह भी नहीं पता कि जिस ‘आजाद कश्मीर’ का ढोल पाकिस्तान सरकार पीटती आ रही है, वह किसी मायने में कश्मीर का नहीं, बल्कि जम्मू का हिस्सा है और कश्मीर के साथ उसका दूर-दूर तक कोई रिश्ता नहीं है। यह सही है कि गिलगित-बाल्टिस्तान और आजाद कहे जाने वाले कश्मीर की पूरी आबादी मुस्लिम है, लेकिन उनके किसी भी हिस्से की भाषा, खानपान, पहनावा और बाकी संस्कृति किसी भी मायने में कश्मीरी नहीं है। यहां तक कि 1947 के बाद ‘आजाद कश्मीर’ के 12 प्रधानमंत्रियों और 26 राष्ट्रपतियों में से एक भी न तो कश्मीरी था और न कश्मीरी भाषा बोलने वाला

ब्रिटिश सरकार के चलते गिलगित-बाल्टिस्तान भारत में शामिल नहीं हो सका 

1947 में जिस समय जम्मू-कश्मीर के महाराजा ने अपने राज्य को भारत में शामिल करने की संधि पर हस्ताक्षर किए, उस समय राज्य का कुल क्षेत्रफल 2 लाख 22 हजार 236 वर्ग किमी था। इसमें गिलगित-बाल्टिस्तान भी था, जो एक अस्थायी संधि के तहत सीधे ब्रिटिश नियंत्रण में था। इसलिए इसका भारत में शामिल होना तय था, लेकिन ब्रिटिश सरकार को यह डर था कि अगर यह इलाका भारत के हाथ में रहा तो समाजवादी सोच और सोवियत संघ के लिए प्रशंसा का भाव रखने वाले नेहरू के नेतृत्व वाला भारत अफगानिस्तान, पूर्वी तुर्किस्तान (आज के चीन का शिंजियांग) और तजाकिस्तान के रास्ते सोवियत संघ के साथ सीधे जुड़ जाएगा, जो ब्रिटिश- अमेरिकी खेमे के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकता है।

ब्रिटिश सेनापति मेजर ब्राउन ने गिलगित-बाल्टिस्तान की पाक में विलय की घोषणा कर दी थी

इसी कारण इस इलाके के ब्रिटिश सेनापति और गिलगित स्काउट्स के मेजर ब्राउन ने गिलगित-बाल्टिस्तान को महाराजा वाले कश्मीर को वापस सौंपने के बजाय उसके पाकिस्तान में विलय की घोषणा कर दी। दूसरी ओर पाकिस्तान ने हमला करके मुजफ्फराबाद से पुंछ तक लगने वाले जम्मू के 13 हजार वर्ग किमी से ज्यादा बड़े हिस्से पर भी कब्जा कर लिया।

पाक कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर दो हिस्सों में बटा, गिलगित-बाल्टिस्तान और ‘आजाद कश्मीर’

इसके बाद पाकिस्तान सरकार ने अपने कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के इस पूरे क्षेत्र को दो हिस्सों में बांट दिया। गिलगित-बाल्टिस्तान को नार्दर्न एरिया नाम दे उसे सीधे पाकिस्तानी सरकार के नियंत्रण में दे दिया, जबकि बाकी हिस्से को ‘आजाद कश्मीर’ नाम दिया गया। वहां के प्रशासन को एक आजाद चेहरा देने के लिए एक निर्वाचित असेंबली और सुप्रीम कोर्ट जैसे संस्थानों की भी व्यवस्था की गई, लेकिन असली ताकत इस्लामाबाद के ही हाथ में रही।

पाक शिकंजे में ‘आजाद कश्मीर’ की परेशान जनता लंबे समय से आंदोलन चला रही

हालांकि पाकिस्तान के शिकंजे में परेशान ‘आजाद कश्मीर’ की जनता लंबे समय से आंदोलन चला रही है, पर पाकिस्तान सरकार फौज और आतंकी संगठनों की मदद से इस आंदोलन को दबाए हुए है। पिछले कुछ दशकों में वहां अलकायदा, हिजबुल मुजाहिदीन और लश्करे तैयबा जैसे आतंकी संगठनों के लिए ट्रेनिंग कैंप और रहने-छिपने के ठिकाने बनाकर पूरे इलाके का चरित्र ही बदल डाला गया है। गिलगित-बाल्टिस्तान में दर्जन भर कबीलों में बिखरी शिया आबादी को दबाकर रखने के लिए पाकिस्तान सरकार इन्हीं आतंकी संगठनों का इस्तेमाल कर रही है। ‘आजाद कश्मीर’ के अधिकारों के लिए लड़ने वाले सैंकड़ों स्थानीय कार्यकर्ताओं की पिछले दशकों में हत्याएं हो चुकी हैं या वे हमेशा के लिए गायब किए जा चुके हैं, फिर भी पाकिस्तान कश्मीर के पूरे नैरेटिव को भारतीय कश्मीर पर ही केंद्रित रखने में सफल है।

पाक की ‘आजाद कश्मीर’ में घटती लोकप्रियता

पाकिस्तान के गैरकानूनी कब्जे वाले ‘आजाद कश्मीर’ में अपनी घटती हुई लोकप्रियता और वहां के लोगों की पाकिस्तान के खिलाफ बढ़ते जा रहे विरोध और नाराजगी पर लगाम कसने के लिए इस साल पाकिस्तान सरकार ने ‘आजाद कश्मीर’ के संविधान में परिवर्तन का फैसला किया है। इस कदम का वहां के नेता दुनिया भर में विरोध कर रहे हैं, लेकिन भारतीय मीडिया में इसकी खबर तक नहीं है।

‘आजाद कश्मीर’ का अपना संविधान है, फिर भी पाक के हाथ है कमान

कुछ साल पहले ह्यूमन राइट्स वॉच ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि ‘आजाद कश्मीर’ का अपना संविधान है जिसमें ऐसे कई तंत्र हैं, जिनसे अपना शासन खुद चलाने वाली सरकार बनती है। इन तंत्रों में निर्धारित समय पर होने वाले चुनावों से चुनी गई विधायिका, परोक्ष तरीके से चुना गया राष्ट्रपति, एक स्वतंत्र न्यायपालिका और स्थानीय प्रशासन के नागरिक निकाय हैं, लेकिन ये सारे प्रावधान झूठे हैं। पाकिस्तान की फेडरल मिनिस्ट्री ऑफ लॉ एंड कश्मीर अफेयर्स द्वारा तैयार किए गए इस संविधान के सेक्शन-56 में यह प्रावधान भी है कि वहां की निर्वाचित सरकार को भले ही वहां की असेंबली का कितना भी समर्थन क्यों न हो, फिर भी पाकिस्तान सरकार उसे जब चाहे बर्खास्त कर सकती है। बर्खास्त न किए जाने की हालत में भी जब यह सरकार चलती है तो उसकी असली कमान इस्लामाबाद के हाथ में होती है।

‘आजाद कश्मीर’ पर सारे अधिकार काउंसिल के हाथ में हैं, फैसलों को चुनौती नहीं दी जा सकती 

दिखावे के लिए ‘आजाद कश्मीर’ का प्रशासन मुजफ्फराबाद में स्थापित ‘आजाद कश्मीर’ की निर्वाचित ‘सरकार’ और इस्लामाबाद से काम करने वाली ‘आजाद कश्मीर’ काउंसिल मिलजुल कर करते हैं, पर सारे अधिकार काउंसिल के हाथ में हैं, जिसकी अध्यक्षता खुद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री करते हैं। काउंसिल के अधिकार क्षेत्र में ‘आजाद कश्मीर’ को हर मायने में नियंत्रित करने वाले 52 विषय आते हैं, जिनके बारे में किसी भी फैसले को चुनौती देने का अधिकार ‘आजाद कश्मीर’ सरकार तो क्या, पाकिस्तान के किसी भी न्यायालय को नहीं है।

पाक संविधान में ‘आजाद कश्मीर’ और गिलगित-बाल्टिस्तान को पाक का हिस्सा नहीं माना गया

कारण यह है कि पाकिस्तान के संविधान में ‘आजाद कश्मीर’ और गिलगित-बाल्टिस्तान को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं माना जाता। यह देख हैरानी होती है कि भारत में कश्मीरी अलगाववाद का समर्थन करने वाले बुद्धिजीवी, राजनेता और पत्रकार न तो कभी कथित आजाद कश्मीर की जनता पर होने वाले अत्याचारों पर ध्यान देते हैं, न वहां चल रहे पाकिस्तानी दमन के खिलाफ मुंह खोलते हैं।

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